गाँधी, खादी और सरकार
गांधी जी के लिये खादी एक वस्त्र नहीं, विचार था. एक महासाम्राज्य को
परास्त करने का, ग्राम स्वावलंबन का,
सामाजिक परिवर्तन का. अर्थात गाँधी जी इसके माध्यम से आर्थिक, सामाजिक एवं
राजनैतिक परिवर्तन चाहते थे. जो पहने सो काते, जो
काते सो पहने – गांधी के इस सूत्र ने घर घर चरखे का प्रसार किया और कपास की खपत छोटे छोटे औजारों के माध्यम से विकेन्द्रित
रूप में होने लगी. आम लोग चरखे के माध्यम से खादी के श्रमिक बने. इसी श्रम शक्ति
ने उस समय के समाज को स्वतंत्रता आन्दोलन के लिए उद्वेलित किया. चरखे के माध्यम से
खादी व्यक्तिगत ‘स्वराज’ का प्रतीक बना. हर नागरिक के हाथ में स्वावलंबन पाने का
एक तंत्र तथा स्वतंत्रता प्राप्त करने का एक औजार और विचार भी. खादी तत्कालीन भारत
में राजनैतिक उद्देश्यों के पूर्ति का भी कारण बनी. उपनिवेशियों के षड्यंत्रों
द्वारा कुचले गये इस प्राथमिक ग्रामोद्योग को पुनर्जीवित करने हेतु बापू को भगीरथ प्रयत्न करने पड़े.
गांधीजी के लिये चरखा आज़ादी की लड़ाई में एक तलवार बना, असहायों के आन्दोलन का माध्यम
बना और अहिंसा का सशक्त हथियार बना. साथ ही बापू के समझ के अनुसार खादी को भारत की
आर्थिक आजादी की भी कुंजी बनाना था. 1929 में बापूजी ने एक चरखा अभिकल्प
प्रतियोगिता घोषित की. इस के लिये एक लाख का
पुरस्कार भी घोषित किया. रुपये 150/- से कम कीमत
वाला, प्रति वर्ष 5-7 रुपये से कम मरम्मत खर्च वाला और पूनि बनाने की सुविधावाला
यह सुवाह्य (portable) और पेडल द्वारा भी
चलाने लायक चरखे की उत्पादकता करीब पाँच गुना होना था. दुर्भाग्यवश बापूजी के
जीवनकाल में इस चुनौती का उत्तर कोई नहीं दे पाया.
गांधीजी ने सुझाव दिया कि सभी उत्पादक
संस्थायें स्वावलंबी बनें और अपने अपने क्षेत्र
के लिये पर्याप्त खादी बनायें. साथ
ही स्थानीय बाजार भी ढूंढा जाये. कुल मिलाकर स्थानीय
स्तर के खादी संस्थान अपने को स्वायत्त बनायें और स्वावलंबी होवें यहाँ तक कि केंद्रीय संघटन को
नज़रअंदाज़ कर आगे बढ़ें. मुख्य रूप से खादी को
पूर्ण-रोजगार का साधन न मानकर अतिरिक्त कमाई की एक संभावना के रूप में माना जाये. देश आजाद होने के बाद
खादी के कार्य में तब तक कोई रूकावट नहीं आयी जब तक गाँधी जी के साथ के लोग खादी
के कार्य में लगे रहे और सरकार में भी स्वतंत्रता आन्दोलन के समय के लोग बने रहे. अस्सी के दशक के बाद खादी
की नीतियों काफी परिवर्तन हुए जो इसके विकास में आशातीत सफलता नहीं दिला सके. दस
वर्ष की मनमोहन सरकार में खादी संस्थाएं सरकार और आयोग से नीतिगत विषयों को लेकर
संघर्ष करती रही जिसका कोई अनुकूल परिणाम प्राप्त नहीं हुआ.
खादी ग्रामोद्योग आयोग के कैलेंडर और डायरी पर गाँधी जी की जगह भारत के
प्रधानमंत्री मोदी जी का चरखा चलाते हुए फोटो छापने पर जो विवाद हुआ वह
अचानक नहीं है बल्कि यह वर्तमान सरकार के आने के पश्चात् खादी ग्रामोद्योग आयोग
द्वारा गाँधी की खादी में जो नीतिगत बदलाव किये जा रहे है यह उसके विरोध स्वरुप
है. वर्तमान आयोग द्वारा मोदी जी को खुश करने के चक्कर में जो भी प्रतिकूल निर्णय
लिए जा रहे है उससे न केवल आयोग के कर्मचारी बल्कि खादी संस्थाओं के पदाधिकारी और
कार्यकर्त्ता भी आयोग के विरुद्ध खड़े हैं. फोटो कांड पर मुम्बई में आयोग के कर्मचारियों द्वारा विरोध जताने पर तो
सम्पूर्ण देश में मानो भूचाल आ गया परन्तु पूरे देश में खादी संस्थाओं द्वारा आयोग की विभिन्न नीतियों के
विरोध में जो आवाज उठाई जा रही है वह न तो मीडिया में आ रहा है और न ही विभिन्न
राजनैतिक दलों के नेताओं से उसका समर्थन मिल पा रहा है. इसका अर्थ है कि खादी
संस्थाओं में नेतृत्व का आभाव है और तथाकथित खादी के नेता कुछ कर पाने में असमर्थ
है.
खादी संस्थाओं और उनके नेताओं के लिए यह एक गंभीर विचारणीय प्रश्न
होना चाहिए कि खादी ग्रामोद्योग आयोग के मुट्ठी भर कर्मचारियों ने एक मुद्दा उठाया
तो पुरे देश में चर्चा हुयी और उसका कुछ समाधान हुआ, आयोग पर कुछ दबाव बना. परन्तु
उनके द्वारा उठाये मुद्दों की कोई सुनवाई नहीं हो रही है. इसका एक प्रमुख कारण भी
है कि खादी ग्रामोद्योग आयोग में
कर्मचारियों की दो यूनियन है. एक के अध्यक्ष भारत सरकार के मंत्री प्रकाश जावडेकर
है तो दूसरी यूनियन के अध्यक्ष लोकसभा में शिवसेना के सांसद हर्सुल जी है. शिवसेना
मोदी सरकार में शामिल होते हुए भी उसके नीतियों के विरोध में जादा जानी जाती है और कोई ऐसा मौका नहीं चूकना चाहती जिससे
सरकार की किरकिरी हो. डायरी और कैलेंडर का मुद्दा भी उन्होंने लपक लिया. उसके बाद
आयोग और सरकार की जो फजीहत हुयी वह सबके सामने है.
इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि खादी संस्थाओं को भी अपनी गैर राजनैतिक
छवि को समाप्त कर राजनैतिक दलों के शरण में जाना चाहिए. वे गाँधी के रचनात्मक
भूमिका में है और उन्हें अपने को वहीं तक केन्द्रित रखना चाहिये, लेकिन गाँधी के
आत्मबल के साथ. खादी और ग्रामोद्योग आयोग तथा सरकार तो गाँधी की खादी को भूल गयी
है, परन्तु खादी संस्थओं पर ही यह आशा टिकी हुयी है कि वे उसे बचा कर रखे. आज अधिकतर खादी संस्थाओं का आत्मविश्वास तो
डगमगाया हुआ है परन्तु उससे भी बड़ी बात यह है की उन्हें सरकारी सब्सिडी के सहारे
की आदत सी पड़ गयी है. उनके अन्दर जो सामर्थ्य, शक्ति और ऊर्जा है, वे उसे पहचान
नहीं पा रहे है, भूल गए है. पर जिन्होंने पहचान लिया है वे संस्थाएं अपने पैरों पर
खड़ी है. उन्हें सरकारी सहायता की आवश्यकता नहीं है.
खादी के सुधार के लिए समय समय पर सरकार द्वारा बहुत सी समितियां बनाई
गयी जिसमे अशोक मेहता कमेटी, पन्त कमेटी, रामक्रिशनय्या कमेटी, पूर्व प्रधानमंत्री
श्री पी. वी. नरसिम्हा राव की अध्यक्षता में हाई पॉवर कमेटी आदि प्रमुख है. पर कभी
भी इन समितियों के सुझावों को पूर्ण रूप से लागू नहीं किया गया जिसके फलस्वरूप
आज खादी और संस्थाओं की यह दुर्दशा है. केवल
सरकार को दोष देने से ही काम नहीं चलेगा. खादी संस्थाओं के शीर्ष संगठन खादी मिशन
और सर्व सेवा संघ भी इसके लिए बहुत कुछ नहीं कर पाए. सर्व सेवा संघ ने तो विरासत
में मिली इस धरोहर को इस आशा में खादी ग्रामोद्योग आयोग को सौंप दिया था कि खादी
के अधिकतर वरिष्ठ लोग आयोग में खादी का कार्य देखने लगे थे. परन्तु समय के साथ साथ
पुराने अनुभवी लोग जाते गए और आने वाले नए लोगो को इसकी समझ थी नहीं. सर्व सेवा
संघ की खादी समिति अब कुछ सक्रिय हुयी है. उसने अपनी एक रिपोर्ट भी सरकार को सौंपी
है. आवश्यकता इस बात की भी है कि वस्त्र मंत्रालय की टेक्सटाइल पालिसी की भांति
भारत सरकार खादी के जानकार लोगो को लेकर एक खादी पालिसी बनाये जिसे वास्तव में
अमलीजामा पहनाया जाये.
यह कितनी अजीब बात है कि खादी ग्रामोद्योग आयोग एक मीटर भी खादी का
कपडा नहीं बनाता और पूरे देश में ढिंढोरा पीट रहा है जैसे वही गांव गांव जाकर
कतिन्न बुनकरों से कपड़ा बनवा रहा है. अत्यधिक वेतन पाने वाले इसके कर्मचारी तो
अपनी कुर्सी से हिलते भी नहीं, अधिकारी वातानुकूलित कमरों से बाहर निकलते नहीं और
आयोग कभी फैशन के नाम पर, कभी भवन के उद्घाटन के नाम पर, कभी चरखे को एअरपोर्ट पर
तो कभी कनाट प्लेस, दिल्ली में लगा कर तो कभी कैलेंडर और डायरी से हटा कर तो कभी
जोड़ कर खोखली वाहवाही बटोर रहा है. वास्तव में खादी का उत्पादन करने वाली संस्थाओं
का तो उत्पीडन हो रहा है. उनकी समस्याओं को न तो खादी आयोग और न ही सरकार सुनती
है. केवल नादिरशाही हुक्म देती है, शोषण करती है जिसकी कोई सुनवाई भी नहीं होती.
आरंभ में खादी ग्रामोद्योग आयोग खादी के कार्य को सामाजिक और रोजगार
परक कार्य मानते हुए अपनी नीति तय करता था और उसी अनुरूप सहायता का स्वरुप बनाता
था. इसी के अनुसार खादी का पड़ता चार्ट बनाया जाता था. आयोग ने हाल में ही निर्णय
लिया है कि वह अपने खर्चो की पूर्ति के लिए ना लाभ ना हानि के आधार पर काम करने
वाली संस्थाओ से विभिन्न खर्चो की वसूली करेगा.
खादी का प्रमाण पत्र लेने या नवीनीकरण करने के लिए जो फीस रूपए ५०००/-
थी उसे मई २०१६ में बढ़ा कर रुपये ५०,००० /- कर दिया गया है. संस्थाओ के काफी विरोध
करने के बाद इसे रूपए ३००००/- कर दिया गया यानि ६०० प्रतिशत बढ़ा दिया गया है. इसी
प्रकार आयोग ने अगस्त २०१५ से ऑडिट फीस
लेने का भी निर्णय लिया है जबकि संस्थाओ को चार्टर्ड अकाउंटेंट से ऑडिट करवाना
पहले से ही आवश्यक है. इसकी न्यूनतम राशी
रूपए ५०००/- तथा अधिकतम रूपए ३००००/- रखी गयी है. पिछले ६० वर्षो में ऐसा कभी नहीं
हुआ.
आयोग ने देश की सभी संस्थाओ के विरोध के बावजूद खादी मार्क लागू किया
जिसकी शर्ते खादी के स्वरुप को नष्ट करने वाली है. जून २०१६ से खादी संस्थाओं के
लिए प्रति पांच वर्ष फीस रूपए १०,०००/-, व्यक्तिगत रूपए २५०००/- तथा कंपनी के लिए
रूपए ५,००,०००/- रखा गया है. तात्पर्य यह है कि खादी की जो पवित्रता खादी
संस्थाओ द्वारा गावों में रोजगार देने के लिए बना कर रखी गयी थी, वह
खुले बाजार के हवाले कर दी गयी है. सरकार ने सिल्क मार्क, हैंडलूम मार्क, आदि भी बनाये
है परन्तु यह स्वेच्छिक है. इसे लेने के लिए उत्पादन या बिक्री करने वालों पर किसी
प्रकार का दबाव नहीं बनाया जाता या उनकी बांह नहीं मरोड़ी जाती. इतना ही नहीं जून
२०१६ से खादी आयोग ने संस्थाओं की कुल बिक्री पर २ प्रतिशत रायल्टी वसूलने का
निर्णय लिया है जिसे काफी विरोध के बाद स्थगित किया गया है. यह सब सातवे वेतन आयोग
की करामात है कि आयोग अपने कर्मचारिओं के खर्चे पूरे करने के लिए इस प्रकार के
हथकंडे सरकार के दबाव में अपना रही है. फीस / मूल्यों में इस प्रकार की बढौतरी किसी
भी क्षेत्र में नहीं होती चाहे वह शिक्षा, उद्योग, व्यापार, कृषी, बिजली, पानी या
आम उपभोक्ता से जुड़ी कोई भी वस्तु क्यों न हो.
आयकर से छूट प्राप्त करने के प्रमाण पत्र जारी करने के लिए आयोग
संस्थाओं से रूपए १०००/- का शुल्क लेता था. परन्तु जनवरी २०१६ से आयोग ने न्यूनतम शुल्क रूपए ५०००/- और अधिकतम
शुल्क रूपए २००००/- प्रतिवर्ष निर्धारित कर दिया है. यह सपष्ट है कि गांधी जी के
समय से ले कर अब तक खादी को जिन आदर्शो पर चलाया गया उस व्यवस्था को छिन्न भिन्न
कर दिया गया है.
इसके अतिरिक्त भी खादी संस्थाओं और कारीगरों को कई समस्यायों से जूझना
पड़ रहा है. संस्थाओं पर यह दबाव डाला जा रहा है कि पूनी खादी ग्रामोद्योग आयोग के
पूनी सयंत्रो से ही ले जिसकी कीमत बाजार में उपलब्ध पूनी से डेढ़ गुणा अधिक और
गुणवत्ता बहुत ही घटिया है जिससे उत्पादन कम और खादी की कीमत अधिक हो जाती है. यदि
बाजार में पूनी १०० रूपए है तो आयोग की पूनी १५० रूपए है.
देश भर में सरकार लगभग हर क्षेत्र चाहे वह औद्योगिक घराने हो या कृषि
का क्षेत्र सभी के लोन माफ़ करती है. यहाँ तक कि हैंडलूम क्षेत्र के लिए भी यू.पी.ए.
सरकार ने हजारों करोड़ रूपए के लोन माफ़ किये परन्तु खादी वालों की कोई सुनवाई नहीं,
ना तो तब और ना ही अब. खादी ग्रामोद्योग आयोग द्वारा खादी क्षेत्र के संपूर्ण क़र्ज़
रुपये २४०८.०२ करोड़ को मुक्त कराने हेतु प्रस्ताव काफी समय पूर्व सरकार को भिजवाया
जा चुका है. आयोग के आंकड़ो के आधार पर सरकार पर केवल रूपए ८३२.६५ करोड़ का आर्थिक
भार होगा. संस्थओं ने बैंक कर्ज से तीन गुणा अधिक तक भुगतान कर दिया है. इस विषय
का अध्ययन भारत सरकार / आयोग द्वारा नियुक्त विशेषज्ञ संस्थाओं / विभागों द्वारा किया जाकर खादी संस्थाओं को
क़र्ज़-मुक्त करने की अनुशंसा की जा चुकी है. फिर भी इस तरफ कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है. खादी के कार्य
एवं संस्थाओं की मजबूती के उद्देश्य से यह आवश्यक है कि सरकार यह लोन माफ़ करे.
खादी की समस्यायों से छुटकारा पाने के लिए यह आवश्यक है कि खादी ग्रामोद्योग
आयोग के साथ साथ सरकार पर भी दबाव बनाया जाये ताकि वे अपनी नीतियों में परिवर्तन
कर खादी के मूल स्वरुप को बनाए रखे और यदि नीतिगत और तकनिकी तौर पर कोई परिवर्तन
करना है तो खादी संस्थाओं को विश्वास में ले कर करे. खादी समिति और संस्थाओं को भी
अपनी भूमिका नए सिरे से पहचानने की आवश्यकता है जो चरखा संघ के समय से चला आ रहा है
तभी गाँधी की खादी का सपना साकार हो सकेगा.
अशोक शरण
संयोजक, खादी समिति, सर्व सेवा संघ, पूर्व निदेशक खादी ग्रामोद्योग
आयोग
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